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श्रीमद् भागवत कथा में दिव्येशराम जी महाराज ने कहा-मानव जीवन बड़ा ही दुर्लभ एवं सौभाग्य से प्राप्त होने वाला अमूल्य रत्न है

रतलाम । हमारे द्वारा किए जाने वाले सत्कर्म का उद्देश्य परोपकार होना चाहिए। यदि मनुष्य का लक्ष्य किसी का अपमान करने का हो तो उसके द्वारा किया जाने वाला परोपकार एवं सत्कर्म भी परिणाम में विनाश एवं विध्वंस को लेकर आता है। जैसे दक्ष ने भगवान शिव के अपमान के उद्देश्य को लेकर यज्ञ का आयोजन किया। लेकिन परिणाम स्वरूप भगवान शिव के क्रोध का अधिकारी बनना एवं मृत्यु का भागी होना पड़ा। मनुष्य अपनी आकृति से नहीं प्रकृति से मनुष्य होता है। जैसे हनुमान जी महाराज आकृति से वानर है किंतु प्रकृति से ज्ञानियों में अग्रगण्य है। उसी प्रकार यदि मानव में दया धर्म, संतोष, संयम, सत्य आदि गुण ना हो तो वह मानव होकर पशु के समान है। महात्माओं ने मानव जीवन को बड़ा ही दुर्लभ एवं सौभाग्य से प्राप्त होने वाला अमूल्य रत्न बताया है जिस की सार्थकता एकमात्र ईश्वर आराधना एवं भक्ति में निहित है।
उक्त विचार श्री कालिकामाता मंदिर सभागृह पर कथा वाचक युवा रामस्नेही संत श्री दिव्येशराम जी महाराज ने श्री रामस्नेही भक्त मण्डल के तत्वावधान में चल रही सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के दुसरे दिन सोमवार को व्यक्त किए। पूज्य गुरूदेव श्री शंभूराम जी महाराज के सानिध्य में चल रही इसकथा में श्रद्घालुजनों को सेनेटाईजर से हाथ धुलवाकर मास्क का वितरण किया जा रहा है।
पोथी पूजन, संत सम्मान एवं महाआरती मुख्य यजमान सुशीलादेवी खण्डेलवाल, मंजु-धीरज खण्डेलवाल, नीरज खण्डेलवाल, विशाल खण्डेलवाल, महेश सोनी, रामेश्वर सोनी, कांतिलाल कुमावत सहित बड़ी संख्या में उपस्थित धर्मालुजनों द्वारा की गई।

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