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श्रीमद् भागवत कथा में दिव्येशराम जी महाराज ने कहा- जीवन वही धन्य है जिसमें भगवान की चरण अरविंद का आश्रय और भक्ति का समावेश हो

रतलाम । हमारे जीवन को परोपकार, जनकल्याण व संसार के प्राणीमात्र का भले करने के लिए लगाना चाहिए। हमारा जन्म लेना तभी सार्थक है जब मृत्यु के बाद भी कीर्ति बनी रहे। मूर्ति से कीर्ति भली संसार में आये है तो बिदाई भी लेना पड़ेगी। मूर्ति तो एक दिन चली जाएगी, परंतु हमारी मूर्ति द्वारा किए गए सद्कर्म कीर्ति के रूप में संसार में सदा के लिए रह जाएगें। तुलसीदास जी पांच सौ वर्ष पूर्व हुए पर आज भी उनकी तुलसी जयंती मनाई जा रही है।
उक्त विचार श्री कालिकामाता मंदिर सभागृह पर कथा वाचक युवा रामस्नेही संत श्री दिव्येशराम जी महाराज ने श्री रामस्नेही भक्त मण्डल के तत्वावधान में चल रही सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन मंगलवार को व्यक्त किए।
उन्होने नृसिंह अवतार के प्रसंग में कहा कि जिस कुल में भक्त जन्म लेता है वह कुल धन्य हो जाता है। माता-पिता धन्य हो जाते हैं। उसके स्वर्ग स्थित पित्र भी धन्य हो जाते हैं और उनको भरोसा हो जाता है कि हमारे कुल में उत्पन्न यह मेरा वंशज वैष्णव मेरा उद्धारक होगा। संतान यदि सुयोग्य हो तो वह पिता के अधर्मी होने पर भी उसका उद्धार कर देती है। जिस प्रकार प्रहलाद ने दैत्य कुल में जन्म लेने पर भी भक्ति का आश्रय लेकर अपने अधर्मी पिता एवं विष्णु विमुख होने पर भी हिरण्यकश्यप का उद्धार भगवान के कर कमलों द्वारा करवा दिया और समस्त संसार में कीर्ति प्रसिद्धि को प्राप्त किया।
जीवन वही धन्य है जिसमें भगवान की चरण अरविंद का आश्रय और भक्ति का समावेश हो। असुर कुल में उत्पन्न होने के बावजूद भी प्रहलाद आज भगवत भक्त कहलाते हैं।
पूज्य गुरूदेव श्री शंभूराम जी महाराज के सानिध्य में चल रही इसकथा में श्रद्घालुजनों को सेनेटाईजर से हाथ धुलवाकर मास्क का वितरण किया जा रहा है।
पोथी पूजन, संत सम्मान एवं महाआरती मुख्य यजमान सुशीलादेवी खण्डेलवाल, मंजु-धीरज खण्डेलवाल, नीरज खण्डेलवाल, विशाल खण्डेलवाल, महेश सोनी, रामेश्वर सोनी, कांतिलाल कुमावत सहित बड़ी संख्या में उपस्थित धर्मालुजनों द्वारा की गई।

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